गाँव का मस्त माहौल

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प्रेषक : अनीश …

हैल्लो दोस्तों, मेरा नाम अनीश है, में कोलकता का रहने वाला हूँ, में फिर से आपके लिए एक मस्त स्टोरी लेकर आया हूँ। ये कहानी इस तरह से शुरू होती है गाँव का माहौल बड़ा ही अज़ीब किस्म का होता है, वहाँ एक तरफ तो सब कुछ ढका छुपा होता है, तो दूसरी तरफ अंदर ही अंदर ऐसे ऐसे कारनामे होते है कि जान जाओ तो दातों तले उंगली दबा लो। वहाँ थोड़ा सा भी झगड़ा होने पर लोग ऐसे तो मोटी मोटी गालियाँ देंगे, लेकिन अपनी बहू बेटियों को दो गज का घूँघट निकालने के लिए बोलेंगे और फिर यही लोग दूसरो की बहू बेटियों पर बुरी नज़र रखेंगे और ज़रा सा भी मौका अगर मिल जाए तो अपने अंदर की सारी इच्छा और गंदी वासना निकाल देगें। मेरा कहने का मतलब यह है कि गाँव में जो ये दबी हुई कामुक भावनाए है, वो विभिन्न अवसरो पर भिन्न-भिन्न तरीक़ो से बाहर निकलती है। गाँव में खेत, खलिहान, पेड़ो का बगीचा आदि कई ऐसी जगहे है जहाँ पर छुप-छुपकर तरह-तरह के कुकर्म होते है, तो कभी उनका पता चल जाता है, तो कभी नहीं चल पाता।

गाँव के बड़े-बड़े घरो के मर्द तो बकाएदा एक ना एक रखेल भी रखते है और जिनके रखेल ना हो उनकी इज़्ज़त कम होती थी। ये अलग बात है की इन बड़े घरो की औरते प्यासी ही रह जाती थी, क्योंकि मर्द तो किसी और ही कुँए का पानी पी रहा होता था, उनकी दूसरो के कुँए का पानी पीने के बाद अपने घर के पानी को पीने की इच्छा ही नहीं होती थी और अगर किसी दिन पी भी लिया, तो उन्हें मज़ा नहीं आता था। तो इन औरतो ने भी अपनी प्यास बुझाने के लिए तरह-तरह के उपाए कर रखे थे कुछ ने अपने नौकरो को फंसा रखा था और उनकी बाँहो में अपनी संतुष्टी खोज़ती थी, तो कुछ ने चोरी छुपे अपने यार बना रखे थे, तो कुछ ऐसे ही दिन रात वासना की आग में जलकर हिस्टीरिया की मरीज़ बन चुकी थी। खैर ये तो हुआ गाँव के माहौल का थोड़ा सा परिचय, अब आज में आपको गाँव के ही एक बड़े घर की कहानी सुनाता हूँ। ऐसे तो आप सभी समझ गये होंगे कि ये गाँव की कोई वासनात्मक कहानी है फिर इसको बताने की क्या ज़रूरत है? जब इसमें कुछ भी नया नहीं है। तो दोस्तों इसमें बताने के लिए एक अनोखी बात है, जो उस गाँव में पहले कभी नहीं हुई थी इसलिए यह स्टोरी बताई जा रही है, तो फिर सुनो मेरी कहानी। यह गाँव के एक सुखी संपन्न परिवार की कहानी है, उस घर की मालकिन का नाम शीला देवी था और मालिक का नाम तो पता नहीं, लेकिन सब उसे चौधरी कहते थे। शीला देवी जब शादी होकर आई थी तो वो दिखने में कुछ खास नहीं थी, उसका रंग भी थोड़ा सांवला सा था और शरीर दुबला पतला था, लेकिन बच्चा पैदा होने के बाद उनका शरीर भरना शुरू हो गया और कुछ ही समय में एक दुबली पतली औरत से एक अच्छी ख़ासी स्वस्थ भरे-पूरे शरीर की मालकिन बन गई थी।

अब पहले जिसकी तरफ इक्का दुक्का लोगों की नज़रे पड़ती थी, वो अब सबकी नजरों की चाहत बन चुकी थी। अब उसके बदन में सही जगह पर भराव आ जाने के कारण हर जगह से कामुकता फूटने लगी थी। अब उनकी छोटी-छोटी चूचीयाँ उन्नत वक्ष स्थल में तब्दील हो चुकी थी, उनकी बाँहे जो पहले तो लकड़ी के डंडे सी लगती थी, अब काफ़ी मांसल हो चुकी थी, उनकी पतली कमर थोड़ी मोटी हो गई थी और पेट पर माँस चढ़ जाने के कारण मोटापा आ गया था और झुकने या बैठने पर दो मोटे-मोटे फोल्ड से बनने लगे थे, उनके चूतड़ों में भी मांसलता आ चुकी थी और अब तो यही चूतड़ लोगों के दिलों धड़का देते थे, उनकी जांघे मोटी-मोटी केले के खंभो में बदल चुकी थी, उनके चेहरे पर एक कशिश सी आ गई थी और आँखे तो ऐसी नशीली लगती थी जैसे दो बोतल शराब पी रखी हो। अब उनकी सुंदरता बढ़ने के साथ-साथ उनको संभलकर रहने का ढंग भी आ गया था और वो अपने आपको खूब सज सवारकर रखती थी। वो बोलचाल में बहुत तेज तर्रार थी और सारे घर के काम वो खुद ही नौकरो की सहायता से करवाती थी।

उसकी सुंदरता ने उसके पति को भी बाँधकर रखा हुआ था, चौधरी अपनी बीवी से डरता भी था इसलिए उसकी कही और मुँह मारने की हिम्मत नहीं होती थी क्योंकि जब बीवी आई थी तो वो बहुत सारा दहेज लेकर आई थी इसलिए वो उसके सामने अपना मुँह खोलने में भी डरता था और बीवी भी उसके ऊपर पूरा हुकुम चलाती थी। उसने सारे घर को एक तरह से अपने कब्ज़े में करके रखा हुआ था। अब बेचारा चौधरी अगर एक दिन भी घर देर से पहुँचता था, तो वो उसे ऐसी-ऐसी बातें सुनाती थी कि उसकी सिट्टी पिटी गुम हो जाती थी और काम-वासना के मामले में भी वो अपनी बीवी से थोड़ा उदास था। शीला देवी कुछ ज्यादा ही गर्म थी, उसका नाम ऐसी औरतों में शुमार होता था जो खुद मर्द के ऊपर चढ़ जाए। उस गाँव की लगभग सारी औरतें उसका लोहा मानती थी और कभी भी कोई मुसीबत में फंसने पर उसे ही याद करती थी।

अब चौधरी बेचारा तो बस नाम का चौधरी था, असली चौधरी तो चौधरानी थी। उन दोनों के एक ही बेटा था, उसका नाम राजेश था और प्यार से सब उसे राजू कहा करते थे, वो दिखने में बचपन से सुंदर था, उसके अंदर थोड़ी बहुत चंचलता भी थी, लेकिन वैसे वो सीधा साधा लड़का था। फिर जैसे ही राजेश थोड़ा बड़ा हुआ, तो शीला देवी को लगा कि इसको गाँव के माहौल से दूर भेज दिया जाए ताकि इसकी पढ़ाई लिखाई अच्छे से हो और गाँव के लड़को के साथ रहकर बिगड़ ना जाए। तो चौधरी ने थोड़ी बहुत विरोध करने की भी कोशिश की हमारा तो एक ही लड़का है, उसको भी क्यों बाहर भेज रही हो? लेकिन उसकी कौन सुनता? तो लड़के को उसके मामा के पास भेज दिया गया जो कि शहर में रहकर व्यापार करता था। मामा को भी बस एक लड़की ही थी, शीला देवी का ये भाई उससे उम्र में बड़ा था और वो खुशी- खुशी अपने भांजे को अपने घर रखने के लिए तैयार हो गया था।

अब दिन इसी तरह से बीत रहे थे और अब चौधरानी के रूप में और ज्यादा निखार आता जा रहा था और चौधरी सूखता जा रहा था। अब अगर किसी को बहुत ज्यादा दबाया जाए तो वो चीज़ इतनी दब जाती है की उतना ही भूल जाता है। अब यही हाल चौधरी का भी था, उसने भी सब कुछ लगभग छोड़ ही दिया था और घर के सबसे बाहर वाले कमरे में चुपचाप बैठा दो-चार निठले मर्दो के साथ या तो दिनभर हुक्का पीता या फिर ताश खेलता रहता था और फिर शाम होने पर चुपचाप सटक लेता और एक बोतल देशी चढ़ाकर घर जल्दी से वापस आकर बाहर के कमरे में पड़ जाता था और नौकरानी खाना दे जाती तो खा लेता नहीं तो अगर पता चल जाता की चौधरानी भूखी बैठी है, तो खाना भी नहीं माँगता और चुपचाप सो जाता था। फिर जब भी उसका लड़का छुट्टियों में घर आता, तो फिर सबकी चाँदी रहती थी क्योंकि जब चौधरानी बहुत खुश रहती थी, घर में तरह-तरह के पकवान बनते और किसी को भी शीला देवी के गुस्से का सामना नहीं करना पड़ता था।

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फिर ऐसे ही दिन, महीने, साल बीतते गये। अब लड़का 18 साल का हो चुका था, वो थोड़ा बहुत चंचल तो हो ही चुका था और उसने 12वीं की परीक्षा भी दे ली थी। अब जब परीक्षा ख़त्म हुई तो वो शहर में रहकर क्या करता? तो शीला देवी ने उसे वापस बुलवा लिया, तो वो अप्रेल में परीक्षा के ख़त्म होते ही गाँव वापस आ गया। अब उस पर नई-नई जवानी चढ़ी थी, अब उसे शहर की हवा लग चुकी थी, वो जिम जाता था तो उसका बदन खूब गठीला हो गया था। फिर जब वो गाँव आया तो उसका खूब स्वागत हुआ और माँ ने खूब जमकर खिलाया पिलाया। अब लड़के का मन भी लग गया था, लेकिन 2-4 दिन के बाद ही उसका इन सब चीज़ो से मन उब सा गया। अब शहर में रहने पर स्कूल जाना, कोचिंग जाना और फिर दोस्तों यारो के साथ समय कट जाता था, लेकिन यहा गाँव में तो करने धरने के लिए कुछ था ही नहीं, बस दिनभर बैठे रहो इसलिए उसने अपनी समस्या अपनी माँ शीला देवी को बता दी।

फिर शीला देवी ने कहा कि देख बेटा मैंने तो तुझे गाँव के इसी गंदे माहौल से दूर रखने के लिए शहर भेजा था, लेकिन अब तू जिद कर रहा है तो ठीक है तू गाँव के कुछ अच्छे लडको के साथ दोस्ती कर ले और उन्ही के साथ क्रिकेट या फुटबॉल खेल ले, या फिर घूम आ, लेकिन एक बात और तू शाम को ज्यादा देर घर से बाहर नहीं रह सकता। तो राजू इस पर खुश हो गया और बोला कि ठीक है मम्मी में तुझे शिकायत का मौका नहीं दूँगा। राजू लड़का था तो उसके गाँव के कुछ बचपन के दोस्त भी थे, तो उसने उनके साथ घूमना फिरना शुरू कर दिया। अब सुबह शाम उनकी क्रिकेट भी शुरू हो गई थी, अब राजू का मन थोड़ा बहुत गाँव में लगना शुरू हो गया था। अब घर में चारों तरफ खुशी का वातावरण था क्योंकि आज राजू का जन्म दिन था। तो शीला देवी ने सुबह उठकर घर की साफ सफाई करवाई और हलवाई लगवा दिया और खुद भी शाम की तैयारियों में जुट गई। अब राजू सुबह से बाहर ही घूम रहा था, लेकिन आज उसको पूरी छूट मिली हुई थी।

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फिर तकरीबन 12 बजे के आस पास जब शीला देवी अपने पति को कुछ काम समझाकर बाजार भेज रही थी, तो उसकी मालिश करने वाली आया आ गई। तो शीला देवी उसको देखकर खुश होती हुई बोली कि चल अच्छा किया आज आ गई, में तुझे खबर भिजवाने ही वाली थी पता नहीं 2-3 दिन से मेरी पीठ में बड़ी अकडन सी हो रही है। तो आया बोली कि मैंने तो जब सुना कि आज मुन्ना बाबू का जन्म दिन है तो चली आई कि कहीं कोई काम ना निकल आए। काम क्या होना था? ये जो आया थी, वो चौधरानी के बहुत मुँह लगी थी, आया चौधरानी की कामुकता को मानसिक संतुष्टि प्रदान करती थी, वो अपने दिमाग़ के साथ पूरे गाँव की तरह-तरह की बातें जैसे की कौन किसके साथ लगी है? कौन किससे फंसी है? और कौन किस पर नज़र रखे हुए है? आदि करने में उसे बड़ा मज़ा आता था। वो आया भी थोड़ी कुत्सित प्रवृति की थी, उसके दिमाग़ में जाने क्या-क्या चलता रहता था? उसे गाँव मौहल्ले की बातें खूब नमक मिर्च लगाकर और रंगीन बनाकर बताने में बड़ा मज़ा आता था इसलिए उन दोनों की खूब जमती भी थी।

फिर चौधरानी सब कामो से फ़ुर्सत पाकर अपनी मालिश करवाने के लिए अपने कमरे में जा घुसी और दरवाज़ा बंद करने के बाद बिस्तर पर लेट गई और आया उसके बगल में तेल की कटोरी लेकर बैठ गई। अब उसने अपने दोनों हाथों में तेल लगाकर चौधरानी की साड़ी को घुटनों से ऊपर तक उठाते हुए तेल लगाना शुरू कर दिया था। अब चौधरानी की गोरी चिकनी टांगो पर तेल लगते हुए आया की बातों का सिलसिला शुरू हो गया था। अब आया ने चौधरानी की तारीफो के पूल बांधना शुरू कर दिए थे, तो चौधरानी ने थोड़ा सा मुस्कुराते हुए पूछा कि और गाँव का हालचाल तो बता, तू तो पता नहीं कहाँ कहाँ मुँह मारती रहती है? तू मेरी तारीफ बाद में कर लेना।

तो आया के चेहरे पर एक अनोखी सी चमक आ गई, क्या हालचाल बताए मालकिन? गाँव में तो अब बस जिधर देखो उधर ज़ोर ज़बरदस्ती हो रही है, परसो मुखिया ने नंदू को पिटवा दिया, लेकिन आप तो आजकल के लड़को को जानती ही हो उन्हें ऊँच नीच का कुछ ख्याल तो है नहीं, नंदू का बेटा शहर से पढ़ाई करके आया है और पता नहीं क्या-क्या सीखकर आया है, तो उसने भी कल मुखिया को अकेले में धर दबोचा और लगा दी चार पाँच पटखनी तो मुखिया अपने घर में अपनी टूटी टांग लेकर पड़ा हुआ है और नंदू का बेटा थाने गया। तो चौधरानी बोली कि हाँ रे इधर काम के चक्कर में तो पता ही नहीं चला, में भी सोच रही थी कि कल पुलिस क्यों आई थी? लेकिन एक बात तो बता मैंने तो ये भी सुना है कि मुखिया की बेटी का नंदू के बेटे से कुछ चक्कर था। तो आया बोली कि सही सुना है मालकिन, उन दोनों में बड़ा जबरदस्त नैन मटक्का चल रहा है इसी से तो मुखिया खार खाए बैठा था, बड़ा खराब जमाना आ गया है लोगों में एक तो ऊँच नीच का भेद मिट गया है, कौन किसके साथ घूम फिर रहा है? ये भी पता नहीं चलता है।

तो चौधरानी बोली कि खैर और सुना, मैंने सुना है तेरा भी आजकल उस सरपंच के छोरे के साथ बड़ा नैन मटक्का चल रहा है, साली बुढ़िया होकर कहाँ से जवान-जवान लंडो को फंसा लेती है? अब आया का चेहरा कान तक लाल हो गया था, छिनाल तो वो थी, लेकिन चोरी पकड़े जाने पर उसके चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई थी और शरमाते और मुस्कुराते हुए बोली कि अरे मालकिन आप तो आजकल के लंडो का हाल जानती ही हो, सब साले छेद के चक्कर में पागल घूमते रहते है। तो चौधरानी बोली कि पागल घूमते है, या तू अपनी जवानी दिखाकर उन्हें पागल कर देती है। अब आया के चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कुराहट दौड़ गई थी, क्या मालकिन में क्या दिखाऊँगी? फिर थोड़ा बहुत तो सब करते है। तो चौधरानी बोली कि थोड़ा सा, साली क्यों झूठ बोलती है? तू तो पूरी की पूरी छिनाल है, तू सारे गाँव के लड़को को बिगाड़कर रख देगी

तो आया बोली कि अरे मालकिन बिगड़े हुए को में क्या बिगाड़ दूंगी? गाँव के सारे लड़के तो दिन रात इसी चक्कर में लगे रहते है। तो चौधरानी बोली कि चल साली, तू जैसे दूध की धुली है। तो आया बोली कि अब जो समझ लो मालकिन, लेकिन आपको एक बात बता दूँ कि ये लड़के भी कुछ कम नहीं है गाँव के तालब पर जो पेड़ लगे हुए है ना उस पर बैठकर खूब ताक झाँक करते है। तो चौधरानी बोली कि अच्छा, लेकिन तुम लोग उन लड़को को भगाती नहीं क्या? तो आया बोली कि चारों तरफ घने-घने पेड़ है, अब कोई उनके पीछे छुपा बैठा रहेगा तो कैसे पता चलेगा? कभी दिख जाते है, तो कभी नहीं दिखते है, बड़े हरामी लड़के है, वो औरतो को चैन से नहाने भी नहीं देते है, लड़के तो लड़के लडकियाँ भी कोई कम हरामी नहीं है।

तो चौधरानी ने पूछा कि क्यों? वो क्या करती है? तो आया बोली कि अरे मालकिन दिखा-दिखाकर नहाती है तो चौधरानी बोली कि अच्छा गाँव का बड़ा गंदा माहौल हो गया है तो आया बोली कि जो भी है मालकिन, अब जीना तो इसी गाँव में है ना। तो चौधरानी बोली कि हाँ रे वो तो है, लेकिन मुझे तो मेरे लड़के के कारण डर लगता है, कही वो भी ना बिगड़ जाए। तो इस पर आया के होंठो के कमान थोड़े से खींच गये, अब उसके चेहरे की कुटिल मुस्कान जैसे कह रही थी कि बिगड़े हुए को और क्या बिगड़ना? लेकिन आया ने कुछ नहीं बोला ।।

धन्यवाद …

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